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“बस्ती में ‘तेल माफियाओं’ का बोलबाला: कानून ताक पर, ग्राहकों की सुरक्षा दांव पर!”

"बस्ती के पेट्रोल पंप: सुविधा शून्य, गुंडागर्दी सौ फीसदी; शिकायत करो तो 'फंसाने' की धमकी!" "पेट्रोल पंप या 'अवैध वसूली' के अड्डे? न हवा-पानी, ऊपर से फर्जी मुकदमों का आतंक!"

अजीत मिश्रा (खोजी)

सुविधाओं के नाम पर पेट्रोल पंपों पर ‘लूट’, उपभोक्ताओं की सुरक्षा और सम्मान दांव पर

  • “सेवा की आड़ में ‘दबंगई’: पेट्रोल पंप संचालकों की मनमानी से बस्ती त्रस्त!”
  • “बस्ती: पेट्रोल पंपों पर न बुनियादी सुविधा, न मानवीय व्यवहार; प्रशासन कब जागेगा?”
  • “आम जनता के सब्र का इम्तिहान: बस्ती के पेट्रोल पंपों पर सुविधाओं का ‘अकाल’, जिम्मेदार खामोश!”
  • “क्या सरकारी मानकों का कोई वजूद नहीं? बस्ती के पेट्रोल पंपों की बदहाली पर एक रिपोर्ट।”

बस्ती। पेट्रोल पंपों पर ‘सेवा’ का दावा करने वाली तेल कंपनियां और उनके संचालक क्या सिर्फ जेब भरने के लिए बैठे हैं? यह सवाल बस्ती जिले के उन अनगिनत पेट्रोल पंपों पर उठ रहा है, जहां उपभोक्ता बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। नियम-कानून ताक पर हैं और पंप संचालक अपनी मनमानी के ऐसे जाल में उलझे हैं, जहां आम जनता का शोषण ही इकलौता नियम बनकर रह गया है।पेट्रोल पंपों पर लिखा होता है—’आपकी सेवा में तत्पर’। लेकिन बस्ती जिले में यह नारा केवल एक मजाक बनकर रह गया है। जिले में संचालित दर्जनों पेट्रोल पंपों पर सुविधाओं के नाम पर उपभोक्ताओं के साथ भद्दा मजाक हो रहा है। यहाँ न तो गाड़ियों के लिए हवा उपलब्ध है, न प्यासे मुसाफिरों के लिए पीने का पानी, और यदि किसी उपभोक्ता ने इन बुनियादी अधिकारों के लिए आवाज उठाई, तो उसे फर्जी मुकदमों में फंसाकर जेल भेजने की धमकी दी जाती है।

न हवा, न पानी, न सुरक्षा: क्या यही है ‘मानक’?

​सरकारी और निजी तेल कंपनियों के मानकों की मानें, तो हर पेट्रोल पंप पर शुद्ध पेयजल, शौचालय, टायर में हवा भरने की मशीन और अग्निशमन यंत्र होने अनिवार्य हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत इन कागजी दावों का मखौल उड़ा रही है। कहीं हवा भरने की मशीन सालों से कबाड़ में तब्दील हो चुकी है, तो कहीं पेयजल के नाम पर सिर्फ धूल फांकते वाटर कूलर नज़र आते हैं। सवाल यह है कि यदि ये सुविधाएं नहीं दी जा सकतीं, तो इन पंपों को लाइसेंस कैसे मिला? सड़क पर सफर करने वाले एक आम आदमी के लिए पेट्रोल पंप सिर्फ ईंधन भरने की जगह नहीं, बल्कि एक जरूरी पड़ाव होता है, जहाँ वह अपनी गाड़ी के टायर की हवा चेक करता है और प्यास बुझाता है। लेकिन बस्ती के ज्यादातर पंप संचालकों ने इन सुविधाओं को पूरी तरह से तिलांजलि दे दी है।

  • कबाड़ में तब्दील मशीनें: कई पेट्रोल पंपों पर हवा भरने वाली कंप्रेसर मशीनें या तो गायब हैं या वर्षों से खराब पड़ी हैं। कर्मचारी इन्हें ठीक करने के बजाय हाथ खड़े कर देते हैं।
  • पीने के पानी का संकट: चिलचिलाती धूप में जब कोई ग्राहक पानी मांगता है, तो उसे बदसलूकी का सामना करना पड़ता है। कहीं फिल्टर खराब है, तो कहीं वाटर कूलर सिर्फ शोपीस बनकर खड़ा है।

शिकायत करो तो ‘फंसा दूंगा’, गुंडागर्दी का खुलेआम प्रदर्शन

​रिपोर्ट का सबसे भयावह पहलू वह है, जहां पेट्रोल पंप के सेल्समैन अपनी दबंगई के बल पर ग्राहकों को धमका रहे हैं। रुधौली इलाके का एक मामला यह साबित करने के लिए काफी है कि यहां ‘सेवा’ की जगह ‘आतंक’ का राज है। जब ग्राहक ने सुविधाओं के अभाव पर सवाल उठाए और शिकायत पुस्तिका मांगी, तो उसे यह कहकर डराया गया कि— “शिकायत की तो एससी-एसटी की धाराओं में फंसा दूंगा।” यह केवल एक धमकी नहीं, बल्कि समाज के सबसे संवेदनशील कानूनों का घोर दुरुपयोग है। यह स्पष्ट करता है कि पंप मालिकों का संरक्षण प्राप्त इन सेल्समैनों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे कानून को अपनी जेब में रखकर चल रहे हैं।

अधिकारियों की चुप्पी: ‘मिलीभगत’ का खेल?

​क्या संबंधित विभाग इन पेट्रोल पंपों पर होने वाली अवैध गतिविधियों से अनजान है? जनता का आरोप है कि समय-समय पर होने वाली जांच खानापूर्ति बनकर रह जाती है। कुछ रुपयों की लेन-देन के बाद मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है। अग्निशमन यंत्रों की कमी और सीसीटीवी कैमरों का अभाव इस बात की गवाही दे रहा है कि किसी बड़ी अनहोनी का इंतज़ार किया जा रहा है।

जनता की प्रशासन से सीधी मांग:

  • औचक निरीक्षण अभियान: जिला प्रशासन और आपूर्ति विभाग की एक संयुक्त टीम का गठन हो, जो बिना पूर्व सूचना के हर पंप की सघन जांच करे।
  • लाइसेंस निरस्तीकरण: जो पेट्रोल पंप संचालक तय मानकों को पूरा नहीं करते और ग्राहकों के साथ बदसलूकी करते हैं, उनका लाइसेंस तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए।
  • फर्जी मुकदमों की जांच: जिन पेट्रोल पंप मालिकों या सेल्समैनों पर फर्जी मुकदमे दर्ज कराने का आरोप है, उन पर ‘प्रताड़ना’ और ‘धमकाने’ का मुकदमा दर्ज कर कड़ी कानूनी कार्रवाई हो।
  • शिकायत निवारण तंत्र: हर पंप पर जिला अधिकारी कार्यालय का एक हेल्पलाइन नंबर बड़े अक्षरों में लिखा हो ताकि आम जनता सीधे अपनी शिकायत दर्ज करा सके।
  • सख्ती से जांच: जिला प्रशासन तत्काल प्रभाव से सभी पेट्रोल पंपों का औचक निरीक्षण करे और निर्धारित मानक पूरे न होने पर लाइसेंस निलंबित करे।
  • शिकायत तंत्र का सरलीकरण: हर पंप पर शिकायत पुस्तिका अनिवार्य हो और उसका सीधा लिंक उच्च अधिकारियों से हो, ताकि स्थानीय स्तर पर मिलभगत की गुंजाइश न रहे।
  • दबंगई पर लगाम: ग्राहकों को डराने-धमकाने वाले सेल्समैनों और उन्हें संरक्षण देने वाले मालिकों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई हो।

संपादकीय टिप्पणी: पेट्रोल पंप संचालकों की मनमानी बस्ती के माथे पर कलंक की तरह है। यदि प्रशासन ने समय रहते इन पर लगाम नहीं कसी, तो भविष्य में यह ‘सुविधाओं का अभाव’ किसी बड़ी अनहोनी या दंगे की शक्ल ले सकता है। अब वक्त आ गया है कि जनता के सब्र का इम्तिहान लेना बंद किया जाए और कानून का राज स्थापित हो। पेट्रोल पंप सिर्फ तेल बेचने की दुकानें नहीं, बल्कि सार्वजनिक सेवा केंद्र हैं। यदि ये संस्थान बुनियादी सुविधा और सुरक्षा देने में विफल हैं, तो प्रशासन को इन पर ताला जड़ने में देरी नहीं करनी चाहिए। जनता अब और अधिक शोषण बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।

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